Shiv Tandav Lyrics In Hindi | शिव तांडव स्तोत्रम (गीतिकाव्य)

SHIV TANDAV STOTRAM (शिव तांडव स्तोत्रम)

Shiv Tandav Stotram
SHIV TANDAV MANTRA

सुनते ही मनं मोह देने वाला, “रावण रचित शिव तांडव स्तोत्रम” आपने सूना हि होगा और कई बार स्तोत्र का जाप किया भी होगा।
जितना यह मन मोहक हैं उतनी ही इस शिव तांडव रचना की कथा भी प्रसिध्द हैं.
स्तोत्रम पढ़ते समय कई बार यह विचार भी आया होगा कि, 
शिव तांडव मंत्रा का हिंदी में मतलब क्या है? 
आज इसी आर्टिकल में हम जानेंगे शिव तांडव के बोल क्या है और इसका मतलब क्या है.

SHIV TANDAV LYRICS IN HINDI (शिव तांडव स्तोत्रम का हिंदी में अर्थ)

जिन्होंने, अपनी जटा रूपी वन से निकलती 
गंगा जी के गिरते हुए प्रभावों से पवित्र किए गये
सर्पो की विशाल माला धारण करके, 
डमरू के ड़म-ड़म शब्दों पर प्रचंड तांडव/नृत्य किया है। 
ऐसे, भगवान शिव जी हमारे कल्याण का विस्तार करें।।१।।

जिनका मस्तक, जटारुपी  कड़ाह में
वेग से घूमती हुई गंगा जी की, 
चंचल तरंग लताओं से सुशोभित हो रहा है, 
ललाट की आग में धक-धक जल रहे हैं;
शीष पर बाल चंद्रमा विराजमान है,
ऐसे भगवान शिव मेरा निरंतर अनुराग हो।।२।।

 गिरिराज किशोरी (पार्वती) की 
 विलासकालोपयोगी शिरोभूषण से,
 समस्त दिशाओं को प्रकाशित होते देखकर 
 जिनका मनं आनंदित हो रहा है; 
 जिनकी निरंतर कृपा दृष्टि से 
 कठिन आपत्ति का भी निवारण हो जाता है,
ऐसे दिगंबर तत्व में मेरा मन आनंदित हो।।३।।

जिनके जटाजूठ पर स्थित भुजंगो के फणों की 
मणियों का फैलता हुआ पिंगल 
(पीले रंग का) प्रभाकुंज,
दिशारूपीनी अंगनाओं (स्त्रियां) के मुंह पर 
कुंकुमराग का अनुलेप कर रहा है;
मतवाले हाथी के हिलते हुए चर्म उत्तरीय वस्त्र 
धारण करने से इसने गवर्नर हुए 
भूतनाथ में मेरा चित्तं अद्भुत विनोद करें।।४।।

जिनकी चरणपादुकाऐ इंद्र आदि समस्त देवताओं के 
प्रणाम करते समय उनके
मस्तक के फूलों की धूलि से आच्छादित हो रही हैं;
नागराज (शेषनाग) के माला से बंधी हुई 
जटावाले भगवान चंद्रशेखर मेरे लिए 
चीरस्थायिनी संपत्ति के साधक हो।।५।।

जिन्होंने अपने ललाट से 
प्रज्वलित हुई अग्नि-ज्वाला के तेज़ से 
कामदेव को नष्ट कर दिया,
जिन्हें इंद्र आदि देवता प्रणाम किया करते हैं,
चंद्रमा की कला से सुशोभित मुकुट वाला वह 
उन्नति विशाल ललाटवाला जटील मस्तक 
हमारी संपत्ति का साधक हो।।६।।

जिन्होंने अपनी विकराल भालपट्ट पर 
धक्-धक जलती हुई प्रचंड अग्नि में,
कामदेव की आहुति दे दी थी, 
गिरिराज किशोरी के हृदय पर 
पत्रभंगरचना करने वाले एकमात्र शिल्पकार 
भगवान त्रिलोचन में मेरी धारणा लगी रहे।।७।।

चीन के कंण्ठ-प्रदेश में नवीन मेघमाला से 
घिरी हुई अमावस्या की आधी रात के समय 
फैलते हुए घने अंधकार के समान 
श्यामलता अंकित है; जो गज चर्म लपेटे हुए हैं 
संसारभार को धारण करने वाले,
चंद्रमा की तरह मनोहर कान्तिवाले 
भगवान शंकर मेरी संपत्ति का विस्तार करें।।८।।

जिनका कंठ नीलकमल समूह की 
शाम प्रभा का अनुकरण करने वाली 
हरिणी सी छवि वाले चिन्ह् से सुशोभित हो रहा है;
जो कामदेव, त्रिपुर, भव-संसार, दक्ष-यज्ञ, 
गजासुर, अंधकासुर और 
यमराज का भी उच्छेदन करने वाले हैं,
ऐसे भगवान शिव को मैं भजता हूं।।९।।

जो अभिमान रहित पार्वती की कला रूप 
कदम्बमंजरी के मकरंदस्रोत की 
बढ़ती हुई माधुरी के रसपान करनेवाले भवरे हैं 
तथा कामदेव, त्रिपुर, भव-संसार, दक्ष-यज्ञ,
गजासुर, अंधकासुर और यमराज का भी 
अंत करने वाले हैं 
ऐसे भगवान शिव को मैं भजता हूं।।१०।।

जिनके मस्तक पर बड़े वेग के 
साथ घूमते हुए भुजंग के फुफाराने से ललाट की  
भयंकर अग्नि क्रमशः धधकती हुई फैल रही है,
धीमीद्-धीमीद् बचते हुए मृदंग के 
गंभीर मंगल घोष के क्रमानुसार 
जिनका प्रचंड तांडव (नृत्य) हो रहा है, 
ऐसे भगवान शंकर की जय हो।।११।।

पत्थर और सुंदर बिछौना में, 
सर्प और मोतियों की माला में, 
बहुमूल्य रत्न एवं मिट्टी के ढेले में, 
 मित्र या शत्रुपक्ष में, 
तृण या कमललोचना युवान स्त्री में, 
प्रजा और पृथ्वी के सम्राट में समान भाव;
रखता हुआ मैं, कब शिवजी को भजूंगा??।।१२।।

सुंदर ललाट वाले भगवान चंद्रशेखर में
एकाग्र चित्त होकर, 
अपने कुविचारों को त्यागकर 
गंगा जी के तटवर्ती निकुंज के भीतर रहता हुआ,
सिर पर हाथ जोड़कर डबडबायी  आंखों से,
 शिव मंत्र का उच्चारण करता हुआ मैं,
 कब सुखी होऊंगा ?।।१३।।

जो मनुष्य इस उत्तम में उत्तम स्तोत्र का 
नित्य पाठ स्मरण और वर्णन करता है, 
वह सदां शुद्ध रहता है और शीघ्र ही।
सुरगुरु शंकर जी की भक्ति प्राप्त कर लेता है,
वह विरुद्ध गति को कभी भी प्राप्त नहीं होता;
क्योंकि शिवजी का भली-भांति चिंतन 
प्राणी वर्ग के मोह का नाश करनेवाला है।।१४।।

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SHIV TANDAV LYRICS (शिव तांडव स्तोत्रम)

 जटाटवीगलज्जल प्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्‌। 
डमड्डमड्डमड्डमनिनादवड्डमर्वयं
चकार चंडतांडवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥१॥

जटा कटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी ।
विलोलवी चिवल्लरी विराजमानमूर्धनि ।
धगद्धगद्ध गज्ज्वलल्ललाट पट्टपावके
किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममं् ॥२॥

धराधरेंद्र नंदिनी विलास बंधुवंधुरस्फुरदृगंत 
संतति प्रमोद मानमानसे ।
कृपाकटा क्षधारणी निरुद्धदुर्धरापदि
कवचिद्विगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥३॥ 

ओम नमः शिवाय, ओम नमः शिवाय
ओम नमः शिवाय, ओम नमः शिवाय
 
जटाभुजंगपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा-
कदंबकुंकुम द्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे ।
मदांध सिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदद्भुतं बिंभर्तु भूतभर्तरि ॥४॥
 
सहस्र लोचन प्रभृत्य शेषलेखशेखर
प्रसून धूलिधोरणी विधूसरांघ्रिपीठभूः ।
भुजंगराज मालया निबद्धजाटजूटकः
श्रिये चिराय जायतां चकोर बंधुशेखरः ॥५॥
 
ललाट चत्वरज्वलद्धनंजयस्फुरिगभा
निपीतपंचसायकं निमन्निलिंपनायम्‌ ।
सुधा मयुख लेखया विराजमानशेखरं
महा कपालि संपदे शिरोजयालमस्तू नः ॥६॥
 
कराल भाल पट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल
द्धनंजया धरीकृतप्रचंडपंचसायके ।
धराधरेंद्र नंदिनी कुचाग्रचित्रपत्रक-
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने मतिर्मम ॥७॥
 
नवीन मेघ मंडली निरुद्धदुर्धरस्फुरत्कुहु 
निशीथिनीतमः प्रबंधबंधुकंधरः ।
निलिम्पनिर्झरि धरस्तनोतु कृत्ति सिंधुरः
कलानिधानबंधुरः श्रियंजगं द्धुरंधरः ॥८॥ 

ओम नमः शिवाय, ओम नमः शिवाय
ओम नमः शिवाय, ओम नमः शिवाय
 
प्रफुल्ल नील पंकज प्रपंचकालिमच्छटा
विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्‌
स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥९॥
 
अगर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी-
रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌ ।
स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं
गजांतकांधकांतकं: तमंतकांतकं भजे ॥१०॥
ओम नमः शिवाय, ओम नमः शिवाय

जयत्वद भ्रविभ्रमभ्रमभ्दूज ग्ड़़मश्र्वस
द्विनिर्गमत्क्रम स्फुरत्का़रालभाल हव्यंवाट्।
धिमिद्धिमिद्धिमि नन्मृदंगतुंगमंगल
ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥११॥
 
दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंग मौक्तिकमस्रजो-
र्गरिष्ठरत्नलोष्टयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।
तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भज्यांमहम् ॥१२॥
 
कदा निलिंपनिर्झरी निकुजकोटरे वसन्‌
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्‌।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌कदा सुखी भवाम्यहम्‌॥१३॥
 
इमं हि नित्यमेव मुक्तमुत्तमोत्तम स्तवं
पठस्मरन्ब्रुवन्नरो विशुध्दीमेती सन्ततम् ।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याती नान्यथा गतिं
विमोहन ही देहिना सुशड्ः करस्य चिन्तनम्॥१४॥

ओम नमः शिवाय। ओम नमः शिवाय।
ओम नमः शिवाय। ओम नमः शिवाय।  

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